Wednesday 18 January 2012

तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गई बेतरतीबी

दो दिन पहले मेरा एक कलम खो गया था. गुज़रे ज़माने की मशहूर मिसाल है कि शायर को अपना दिल खोने पर इतना रंज नहीं होता जितना कलम खोने पर. उस पर जबकि वो कलम किसी ने बतौर नज़राना अता किया हो तब तो दर्द का आलम पूछिए ही मत. इस ज़ासोज़ कैफियत से अभी उबर ही नहीं पाया था कि अगले ही दिन सुबह पेन ड्राइव कहीं गायब हो गई. पूरा दिन उसे ढूंढा लेकिन वो भी दुनिया से उसी तरह गायब हो गई थी जैसे कि रवादारी. कल शाम होते होते पता चला कि एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज जिस पर कुछ ज़रूरी फोन नंबर और एक ना-मुकम्मल नज़्म लिखी थी, वह भी रूठ गया है. इतने सारे बोझ सीने पर लेकर जब घर पहुंचा तो मां को बताया कि वक्त अच्छा नहीं चल रहा और उनके आंचल में छिप गया. मां ने कहा दिमाग एक जगह रखो तो चीजें नहीं खोएंगी, (उन्हे क्या पता कि दिमाग कमबख्त एक ही जगह रखा हुआ है तभी तो चीजें खो रही हैं) कल रात मां ने पूछा कि टिफिन का ढक्कन आफिस में छोड़ आए क्या ? मिल नहीं रहा ! मैने कहा मिलेगा भी नहीं. घर में ढक्कन ढूंढा ही जा चुका था, आज जब से दफ्तर में घुसा ढक्कन ढूंढने के सिवा कुछ नहीं किया,ज़हन ये मानने को तैयार नहीं कि मुझसे भी कोई चीज खो सकती है. लेकिन जब हार गया तब ये पोस्ट लिखने बैठ गया. लिखने की गरज सिर्फ इतनी कि वक्त मेरे ऊपर हंस रहा है कि इसी अहमक की याद्दाश्त के बारे में इसके घर वाले और दोस्त बड़े बड़े दावे करते थे. मुझे याद आ रहा है तो फकत एक शेर -

तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गई बेतरतीबी
पहले मेरा कमरा भी गज़ल जैसा था

4 comments:

नफ़ासत said...

mere jaise ban jaogey jab ishq tumhe ho jayega.. deewaron se takraogey jab ishq tumhe ho jayega...

Alok Bajpai said...

gadhuddin...!!!

Alok Bajpai said...

gadhuddin...!!!

ajitbiomed said...

awesome....