Thursday 12 January 2012

ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता

      ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
      ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता
      
       न तो अपना तुझको बना सके
      न ही दूर तुझसे जा सके
      कहीं कुछ न कुछ तो ज़रूर था
      न तुझे पता न मुझे पता
      ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
            
      सारी ख़ुशियाँ तुझपे वार के
      चला मैं तो सब कुछ हार के
      यही इश्क़ का दस्तूर था
      न तुझे पता न मुझे पता
      ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
       ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता 
                                   (अमीर आगा कज़लबाश)

0 comments: