ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता न तो अपना तुझको बना सके न ही दूर तुझसे जा सके कहीं कुछ न कुछ तो ज़रूर था न तुझे पता न मुझे पता ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता सारी ख़ुशियाँ तुझपे वार के चला मैं तो सब कुछ हार के यही इश्क़ का दस्तूर था न तुझे पता न मुझे पता ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता (अमीर आगा कज़लबाश)




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