जो लखनौवा हैं उनको तो कुछ बताने की ज़रुरतय नही है , कहबे करेंगे कि हिमंसुआ क्या लल्लन टाप नाम रक्खिस है , लेकिन ब्लॉग केवल लखनऊ का नही है भैय्या....बाहर वाले चक्कर में हैं कि ये "अमाँ यार" क्या बला है ? तो उन लोगों को, जिन्होंने न गढ़बढ़झाला देखा है ,न पाटा नाला देखा है , नाका हिंडोला देखा है, न रस्तोगी टोला देखा है , हम बताते हैं कि इस जुमले के माने क्या हैं...?...और ब्लॉग से इसकी क्या नातेदारी...?...दरअसल "अमाँ यार",वह अल्फाज़ हैं , जिनमे लपेट कर कोई अपना दिल सामने वाले को पेश कर देता है, लेकिन दिमाग से रंगबाजी नही उतरती....पूरी दुनिया में इस जज्बे को बयां करने वाला दूसरा जुमला नही , तो आप समझ ही गए होंगे कि, "अमाँ यार" वह सांस्कृतिक थाली है जिसमे तहजीब और तफरी की खिचडी परोसी जाती है ..."अमाँ यार"की थाली में सजी , तहजीब और तफरी की इस खिचडी का असल जायका तो आपको लखनऊ जैसे किसी रिवायती शहर में ही मिलेगा । अपनी तो वहीं कटी है , सो इस खिचडी को खूब छका है ....और बाहरी लोगों को इसके लिए ललचाते भी देखा है....लेकिन मैं चाहूँ तो भी खिचडी तो आपको खिला नही सकता....हाँ एक जुगाड़ किया है, इस खिचडी की खुशबू जो मेरी साँसों में बसी है, उसका कुछ हिस्सा निकाल कर इस ब्लॉग में मिला दिया है । मतलब इस ब्लॉग पर आपको जो भी पकवान परोसे जायेंगे , आप को लग्बैय करेगा की उनमे "अमां यार" की संस्कृति-थाल की तरह ही तहजीब है, तफरी है, और रंगबाज़ी तो हईयै है । इसलिए इस ब्लॉग-थाल का नाम भी हमने "अमाँ यार" ही रखा है.... तो भैय्या थाली सज चुकी है । जल्दी से भोग लगाओ , वरना जो खुशबू उड़ गयी तो बाद में मत कहना कि "ससुरा बतियाए म लगाय दिहिस"
2 comments:
Although lines are few, the message is loud and clear. I appreciate confidence in your writing. Requires immense understanding and observation :)
Uljhakar samjha rahe ho ya samjhakar uljha rahe ho??
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