Monday 7 November 2011

तुम्हे याद करते-करते खूब बिखर के रोए हैं

रातों की तारीकी में आंखें भर के रोए हैं (तारीकी=अंधेरा )
तुम्हे याद करते-2 खूब बिखर के रोए हैं

खामोशी से दिन में अपने दर्द छिपाए रखे हैं
अंधेरों में औंधे मुंह बिफर बिफर के रोए हैं

जाने कैसी बेचैनी थी रात की चादर में लिपटी
तुमको खोने के डर से कितना डर के रोए हैं (6/11/2011)
-हिम