Monday 19 September 2011

जन्मदिन मुबारक आशीष ! :)

''जो आलाज़र्फ़ होते हैं वोह सर को ख़म ही रखते हैं
सुराही खुद निगूं होकर भरा करती है पैमाने !''

(आलाज़र्फ़=महान क्षमता वाले, ख़म=झुका होना, निगूं=झुक कर)

अपने तुरुप के इक्के आशीष नवल के नाम, जिनकी ईमानदार शख्सियत को मेरा ज़मीर अपने लिए सबसे बड़ी अदालत मानता है ...

एक लड़के को देखा तो ऐसा लगा

जैसे बचपन का यार
जैसे भाई का प्यार
जैसे इश्वर का रूप
जैसे सर्दी की धूप
जैसे तरकश का तीर
जैसे दिल का फ़कीर

जैसे पूरी हुई हो कोई दुआ
एक लड़के को देखा तो ऐसा लगा

जैसे कंधे पे हाथ
जैसे मुश्किल में साथ
जैसे लक्ष्मण का खेल
जैसे बच्चों का मेल
जैसे खुद पे यकीन
जैसे अपनी ज़मीन

जैसे बन्दा कोई रब का भेजा हुआ
एक लड़के को देखा तो ऐसा लगा

जैसे उरदू जुबान
जैसे छोटा किसान
जैसे पूरब का गाँव
जैसे छप्पर की छाँव
जैसे जवानी में ख्वाब
जैसे पीला गुलाब

जैसे किसी दस्त-ए-जादू ने मुझको छुआ
एक लड़के को देखा तो ऐसा लगा

और अब एक बंद ये भी- :P

जैसे फर्जी भोकाल
जैसे जी का जंजाल
जैसे स्याही का दाग
जैसे ईनो का झाग
जैसे बनिए का बाँट
जैसे ढाबे की खाट

जैसे शराफत की चक्की में पिसता हुआ
एक लड़के को देखा तो ऐसा लगा ... :P

1 comments:

suyash said...

Aashish bhai...ko salam...bas Nam hi kafi hai