कैसे तुम्हे मनाऊं साथी
रात दिवस है छाती जलती
अनजाने में हुई जो गलती
हरदम यही सोचता कैसे
उसकी ग्लानि मिटाऊं साथी
कैसे तुम्हे मनाऊं साथी
साथ गया सम्मान गया
जीवन से स्थान गया
तुमसे कितना पाया था
कैसे मैं बिसराऊं साथी
कैसे तुम्हे मनाऊं साथी
बाकी रही न कोई आशा
धुंआ हो गयी हर अभिलाषा
अब लगता है जल्दी ही
शायद मैं मर जाऊं साथी
कैसे तुम्हे मनाऊं साथी
Subscribe to:
Post Comments (Atom)




1 comments:
बहुत उम्दा जनाब..
Post a Comment