Tuesday 2 August 2011

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ?

कलम की स्याही सूख जाने और अलफ़ाज़ का जादू ख़त्म हो जाने के बाद भी अगर लिखना पड़ रहा है तो लाजिमी तौर पर कोई बहुत ज़रूरी बात ही लिखी जानी है। कल रात एक ऐसी घटना हुई जो दिल पर पत्थर बन कर बैठ गयी। यकीन मानिए मन की बात आप अच्छी लिखिए, बुरी लिखिए लेकिन उससे दिल का बोझ तो कुछ कम होता ही है। इसीलिए लिख रहा हूँ। साहित्य की कोई गंगा बहाने के लिए नहीं।

इसी शनिवार टीवी पत्रकारिता के गढ़ शहर में अपने एक टीवी पत्रकार दोस्त से उनके चैनल पर खबर रिपीट होने को लेकर भिड गया था। और अंततः उन्होंने माना था के एक ही चैनल पर एक ही तरह की न्यूज़ लगातार चलाना दर्शकों के साथ अन्याय है और दर्शक एक सीमा के बाद इसे देखना पसंद भी नहीं करते।

फिर कल अचानक एक घटना के बाद मेरे अन्दर से ही किसी ने मुझ पर सवाल खड़े कर दिए। और मेरे पास कोई जवाब नहीं था सिवाय शर्मिंदगी के। मैंने ही खुद से पुछा की खबर रिपीट होने के मुद्दे पर बहस करने का मुझे क्या नैतिक अधिकार है। मैं भी तो वही कर रहा हूँ कितने महीनों से। मेरा चैनल जिसे बमुश्किल पांच लोग देखना चाहते होंगे कभी भी ऑन किया जाय सिर्फ एक ही खबर दिखाता है। हर वक़्त एक ही खबर। दूसरे शब्दों में मेरे कीमती दोस्तों में से कोई भी मुझसे बात करे मेरे पास कुछ नया नहीं होता। कितने महीनों से यही चल रहा है। ये तोह कहिये की सच्चे दोस्त टी वी के दर्शकों की तरह पल में साथ नहीं छोड़ते। मैं खुशनसीब हूँ की मुझे ऐसे दोस्त मिले जो किसी और चैनल पर नहीं जाते और हर वक़्त मेरी उस पुरानी खबर को भी उतने ही चाव से सुनते हैं जैसे की वो कोई ताज़ा ब्रेकिंग सुन रहे हों। ऐसे एक से ज्यादा दोस्त हैं। वोह मुझे फ़ोन लगायें या मैं उन्हें बात मैं ही करता हूँ और एक ही विषय पर। लेकिन अब मुझे लगता है की ये उन कीमती दोस्तों की दोस्ती के प्रति मेरा अन्याय है। ये मुद्दे को लेकर मेरा दोहरा मापदंड भी है। आखिर कब तक वे मेरा चैनल नहीं बदलेंगे और अगर उन्होंने न भी बदला तब भी मैं उनपर इस तरह का अत्याचार सिर्फ इसलिए तोह नहीं कर सकता क्यूंकि वोह मेरे दोस्त हैं। बेहतर है की अब खबरें बदली जाएँ।

ये हिमांशु जिसे उसके दोस्तों ने कभी सुलतान-उल-अहबाब (दोस्तों का सुलतान) के लकब से नवाज़ा था आज इतना आत्मकेंद्रित हो गया है की अपने दोस्तों से उनका हाल-ओ-अहवाल भी नहीं पूछ पाता। बस अपनी ही बात करने में उलझा रहता है। जबकि उसे अच्छे से पता है की उसके हर दोस्त की अपनी कहानी भी उससे कम उलझी हुई नहीं। लेकिन फिर भी ये तथाकथित सुलतान-उल-अहबाब को कभी इतनी तौफीक भी नहीं होती की अपने मित्रों से पूछे की तुम्हारी मुश्किलों का क्या हुआ ? तुम कैसे हो ? जैसे लगता है की सारी मुश्किलें सिर्फ मुझे ही हुई हैं। दोस्त हँसते रहते हैं, मुझे सुनते रहते हैं तोह मैं उनकी मुश्किलें ही नहीं समझ पाता। कितना हल्का दोस्त हूँ मैं।

कल भी ऐसा ही हुआ । अपनी एक लाजवाब मित्र को अपनी उलझाऊ बातों से मैं बहुत देर तक पकाता रहा और हर बार वोह न सिर्फ सब्र के साथ मुझे समझाती रही बल्कि बेशुमार चुटकुलों के साथ माहौल को हल्का भी करने की कोशिश करती रही। फिर उसने कहा चलो कुछ और दिलचस्प बात करते हैं और इस पर मैंने उससे पुछा की और बताओ मिनट वाले साहब कैसे हैं ?(इशारा उसके प्रेमी की तरफ था) इस पर उसने लिखा- प्लीज़ इस पर बात मत करो. अभी २ महीने पहले एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी। मेरे होश उड़ गए ! आम तौर पर इस तरह के अनुभव के बाद हर आदमी सॉरी लिखकर माफ़ी जताता है। मेरी हिम्मत ही नहीं हुई ये शब्द लिख पाने की। क्यूंकि या तोह ये शब्द बहुत हल्का था या मैं खुद। इन दो महीनों में मेरी उससे कम बात हुई थी। लेकिन फिर भी कमसे कम ३ बार। और तीनों बार एक ही बात। मेरी बात। लेकिन हर बार उसने मुझे एक मां की तरह प्रेरणा दी, एक बहन की तरह प्यार किया और एक दोस्त की तरह चुटकुले सुनाये। मैं कभी भी उसकी हंसी के पीछे छुपे दर्द को नहीं पहचान पाया। कैसा सुलतान-उल-अहबाब हूँ मैं ?

कल जब उसने खुद देखा की अब हिमांशु नहीं आगे नहीं लिख पा रहे हैं। तो उसने खुद मुझे लिखा - तुम इससे दुखी मत होना अब। मैं इससे उबरने की कोशिश कर रही हूँ। अपनी तरफ से पूरा प्रयास। मैं वोह सब कर रही हूँ जो दूसरे खुश लोग कर रहे हैं। मैं हंस रही हूँ, गा रही हूँ रो भी रही हूँ। मुझे उम्मीद है सब ठीक हो जाएगा। तुम बस साथ रहना । इसके बाद तुरंत उसने बात बदलते हुए कहा- तुम लखनऊ की कुर्ती लाना मेरे लिए चिकन वाली और पैसे तुम्हे लेने पड़ेंगे समझे !!!

ये हल्का दोस्त २२ साल की उस छोटी लेकिन समझदार लड़की को क्या देने के काबिल है ? सिर्फ माफ़ी मांग सकता हूँ अपने दोस्तों से। कुछ सही करने के लिए नहीं बस अपना दिल हल्का करने के लिए। उस अनमोल dost से भी माफ़ी चाहता हूँ जिसे मैंने खबर रिपीट करने के चक्कर में खो दिया, और उनसे भी जिन्हें शायद भविष्य में खो दूँ, अगर न बदला। कोशिश करूँगा की ऐसा न हो !

5 comments:

Bees.world said...

well written! dosti nibhane me to aap ab bhi no.1 hain himanshu ji..aur humesha rahenge.

Being Myself said...

Khabar kitni bhi repeat hui ho, yadi darshakon ne channel ka saath nahi chhoda iska matlab yahi hai ki wo aaj bhi unka no. 1 channel hai aur hamesha rahega. Uss channel pe prasaarit hone wala har chhota-bada kaaryakram apne aap hi unka pasandeeda ho jata hai aur hamesha hota rahega. Doston ke beech mein maafi ki zarurat nahi, sirf aapsi samajh ki zarurat hai. Aapke bina kahe dost sun bhi lenge aur samajh bhi lenge, jaise aap karte hain :)

Mohit said...

agar koi tumhare channel se bore ho gaya hai to ye uski badnaseebi hai..bachpan me jab cable channel naya naya aaya tha..to cable ki light jana aam baat thi..sony..zeetv dekhne wale jab light chali jaati thi to wapas doordarshan metro ki taraf rukh karte the..joki humesha aata rehta tha..tumse jitne dost jude rahe hain..unhe ye pata hai ki tumhari nishtha aur samarpan ka koi jod nahi hai..wo jaante hain ki jab cable tv ki light chali jayegi to ek kavi him hi hai jo DD2 ki tarah prasaran deta rahega..aur aisi nishta aur mitrata aaj k samaj me milna bahut mushkil cheez hai..to vishwas rakho jinhe tumhari parakh hai wo tumhe khone ki bhool nahi karenge..bhale hi tum kisi bhi purani khabar ki charcha karte raho!aur humara tumse yahi nivedan hai ki khush raho..mast raho kyunki yahi swabhaav tum par jachta hai..itne lambe antraal k baad likhne par khushamdeed!!

मयंक said...

अगर ये बात समझ पा रहे तो मतलब अभी तक तुम्हारी दोस्तियां टूटने और साथ छूटने का वक्त नहीं आया है....खुशी की बात ये है कि ये बात तुमको समझ में आई...और अगर वाकई ये दिल से लिखा गया है...तो यकीन मानो कि शायद अभी उम्मीद बाकी है..

आग़ाज़.....नयी कलम से... said...

bhut acha him bhai.... imotional kr diya aapne...