Friday 1 July 2011

‘मुझे तुमसे चिढ़ होती है, दूर जाओ !’

अपनी दुनिया में मस्त रहने वाले कलंदर को यूं ही एक दिन एक पत्थर का टुकड़ा मिल गया. उसके मन को दिखाई देने की बीमारी थी, सो इस बार उसने इसमें एक ईश्वर का अक्स देखा. देखा तो देखता ही रहा, यहां तक कि उसके प्रति भक्ति भाव भी जाग गया. अब नियम से भगवान पर फूल चढ़ते,पूजा होती, भोग लगता, प्रसाद बंटता.उसने सुन रखा था कि भावना ही पत्थर को भगवान बनाती है इसलिए अपनी भावना को भी उसने इसी कसौटी पर कसा .उसे यकीन था कि उसकी भावना से अभिभूत होकर किसी रोज उसके भगवान बोल उट्ठेंगें और उससे कहेंगे कि तुम्हारी भावना ने मुझे प्रसन्न किया है.ऐसा किसी वरदान के लालच में नहीं बल्कि अपने इष्ट को प्रसन्न कर पाने की योग्यता पर पहुंचने के लिए...

और एक दिन अंतत: वो भगवान बोल उट्ठा- ‘मुझे तुमसे चिढ़ होती है, दूर जाओ !’

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