Sunday 26 February 2012
बड़ी सज़ा है मिली तुमको भूल जाने की
Wednesday 25 January 2012
तुम्हारे गाल के गड्ढ़ों के नाम ...
Wednesday 18 January 2012
तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गई बेतरतीबी
Sunday 15 January 2012
21वीं सदी की लड़की के नाम !
बड़े अदब और एहतराम के साथ उन सभी लड़कियों के नाम जो लादी हुई ज़िंदगी जीने के बजाय चुनी हुई ज़िंदगी जीना पसंद करती हैं ! कुछ के नाम खास तौर पर ;)
वो लड़की जैसे नग़मा है
स्कूल को जाती बच्ची का
वो लड़की जैसे पैराहन (लिबास)
इक रंग बिरंगी तितली का
वो लड़की जैसे आतिश है
पैकरे (शरीर) हुस्न में जो ढल गई
वो लड़की एक मुहब्बत है
दुनिया से आगे निकल गई
वो लड़की एक बगावत है
सब ज़ंग आलूद(ज़ंग लगे हुए) रिवाजों को
वो लड़की कोई मुसीबत है
सब ना माकूल(अनुपयुक्त) समाजों को
वो लड़की जैसे शाहीं (ऊंचा उड़ने वाला बाज़) है
परवाज़ की हसरत साथ लिए
वो लड़की जैसे सुब्ह-ए-नौ (नई सुबह)
पहचान का परचम हाथ लिए
वो लड़की जैसे ज़र्ब (हथौड़ा) कोई
जिसने बंदिश को तोड़ा हो
वो लड़की जैसे कर्ब (दुख) कोई
जिसने ख्वाहिश को छोड़ा हो
वो लड़की जैसे मां कोई
जिसके पैरों में जन्नत है
वो लड़की जैसे बेटी है
जो घर में है तो बरकत है
वो लड़की जैसे बहन कोई
जो बिन राखी बन जाती है
वो लड़की जैसे दोस्त कोई
जो रूठ के फिर मन जाती है
वो लड़की जैसे जानां (महबूबा) हो
जो छेड़ करे शरमा जाए
वो लड़की जैसे पूंजी हो
जो वक्त पड़े तो काम आए
वो लड़की जैसे फूल कोई
न बनठन है न सजधज है
वो लड़की जैसे जादू है
जिसको देखूं तो अचरज है
वो लड़की जैसे तिफ्ल (बच्चा) कोई
जो चांद की ज़िद पर अड़ जाए
वो लड़की जैसे ग़ाजी (विजेता) हो
जो चांद को भी लेकर आए
वो लड़की जैसे चांद है खुद
जो मेरी ज़मी पर आया है
वो लड़की जैसे सिफत (योग्यता) कोई
जिसको किस्मत से पाया है
Thursday 12 January 2012
ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता न तो अपना तुझको बना सके न ही दूर तुझसे जा सके कहीं कुछ न कुछ तो ज़रूर था न तुझे पता न मुझे पता ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता सारी ख़ुशियाँ तुझपे वार के चला मैं तो सब कुछ हार के यही इश्क़ का दस्तूर था न तुझे पता न मुझे पता ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता (अमीर आगा कज़लबाश)
Monday 9 January 2012
एक याद...
कुछ ऐसे ही होते थे 'बजरंगी के चने' भी. बजरंगी, एक बूढा व्यक्ति, हाथों में गज़ब का हुनर. दिन में स्कूल में मीठे-चटपटे चने बेचने वाला; शाम को वही चीज़ें राजा बाज़ार (लखनऊ में मेरा मोहल्ला) की गलियों में आवाजें लगाते हुए घूम-२ कर बेचने वाला. याद बेहद धुंधली हो चली है. न तो बजरंगी की शक्ल याद है, न आवाज़ और न ही वो शब्द जिनके कानों में पड़ते ही घर के बड़े तक उतावले हो उठते थे. जी हाँ, एक सड़क पर बिकने वाली चीज़ जो घर में भी शौक से लायी और खायी जाती थी, सो किसी को हक नहीं था की पैसे मांगने पर डांट सके.
वो तीखे चने.. अच्छे-अच्छों के आँख-नाक से पानी निकाल लाने वाले मगर लालच रहता था वहीं का वहीं. और कुछ याद हो न हो वो स्वाद और उन नारंगी-लाल से चनों की शक्ल अच्छी तरह याद है.
पुरानी ही बात है ये भी कि किसी को पापा से कहते सुना था कि बजरंगी मर गया, इस प्रश्न के जवाब में कि आजकल वो दिखाई नहीं दे रहा. पापा को या उस व्यक्ति को कितना अफ़सोस था, याद नहीं, मगर मुझे था तब भी जबकि मरने का मतलब भी ठीक से पता नहीं था.
इस घटना के बाद वो स्वाद दोबारा नसीब नहीं हुआ. वजह कुछ दिनों पहले ही पता चली. वो हुनर सिर्फ बजरंगी के ही पास था, और किसी के भी पास नहीं, यहाँ तक कि उसके अपने बेटे के पास भी नहीं. इस बार ज्यादा बड़ा अफ़सोस हुआ. मेरी इस सोच को धक्का लगा जो ये कहती थी कि जो सामान इस दुकान पर नहीं मिला वो किसी और पर मिल जायेगा. मेरा मन आज भी ललचाता है मगर अब ये असंतुष्टि हमेशा की है.
बदलते समय के साथ कितना कुछ नया देखने को मिल रहा है मगर बहुत कुछ ऐसा है जो पीछे छूटता जा रहा है. हम ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में इतने व्यस्त हैं कि हमें फुर्सत ही नहीं दो पल को पीछे मुड़कर देखने की. वो बेहद आसान-सी खुशियाँ; आज के समय में अस्तित्वहीन; और हम कभी समझा भी नहीं पाएंगे कि बात किस बारे में कर रहे हैं. आने वाले समय में कोई उन्हें जानेगा भी नहीं और हम भी शायद जल्दी ही भूल जायें.
काफी देर से ही सही, मगर बजरंगी को श्रद्धांजलि!



