Sunday 26 February 2012

बड़ी सज़ा है मिली तुमको भूल जाने की

न रंज खोने का, न कशिश पाने की
बड़ी सज़ा है मिली तुमको भूल जाने की

Wednesday 25 January 2012

तुम्हारे गाल के गड्ढ़ों के नाम ...

वक्त के उस मोड़ पर
जहां तक आते आते
थक चुके होंगे
बाकी सारे किरदार
बस आ पहुंचोगी तुम
तन्हा
क्योंकि तुम थकती नहीं हो
थकोगी भी नहीं
वहीं मै भी मिलूंगा तुम्हे
क्योंकि मै बदलता नहीं हूं
बदलूंगा भी नहीं
वहीं
हंस पड़ोगी तुम दुनिया पर
बेसाख्ता
और मैं
लिख दूंगा कोई कविता
तुम्हारे गाल के गड्ढ़ों के नाम ...

Wednesday 18 January 2012

तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गई बेतरतीबी

दो दिन पहले मेरा एक कलम खो गया था. गुज़रे ज़माने की मशहूर मिसाल है कि शायर को अपना दिल खोने पर इतना रंज नहीं होता जितना कलम खोने पर. उस पर जबकि वो कलम किसी ने बतौर नज़राना अता किया हो तब तो दर्द का आलम पूछिए ही मत. इस ज़ासोज़ कैफियत से अभी उबर ही नहीं पाया था कि अगले ही दिन सुबह पेन ड्राइव कहीं गायब हो गई. पूरा दिन उसे ढूंढा लेकिन वो भी दुनिया से उसी तरह गायब हो गई थी जैसे कि रवादारी. कल शाम होते होते पता चला कि एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज जिस पर कुछ ज़रूरी फोन नंबर और एक ना-मुकम्मल नज़्म लिखी थी, वह भी रूठ गया है. इतने सारे बोझ सीने पर लेकर जब घर पहुंचा तो मां को बताया कि वक्त अच्छा नहीं चल रहा और उनके आंचल में छिप गया. मां ने कहा दिमाग एक जगह रखो तो चीजें नहीं खोएंगी, (उन्हे क्या पता कि दिमाग कमबख्त एक ही जगह रखा हुआ है तभी तो चीजें खो रही हैं) कल रात मां ने पूछा कि टिफिन का ढक्कन आफिस में छोड़ आए क्या ? मिल नहीं रहा ! मैने कहा मिलेगा भी नहीं. घर में ढक्कन ढूंढा ही जा चुका था, आज जब से दफ्तर में घुसा ढक्कन ढूंढने के सिवा कुछ नहीं किया,ज़हन ये मानने को तैयार नहीं कि मुझसे भी कोई चीज खो सकती है. लेकिन जब हार गया तब ये पोस्ट लिखने बैठ गया. लिखने की गरज सिर्फ इतनी कि वक्त मेरे ऊपर हंस रहा है कि इसी अहमक की याद्दाश्त के बारे में इसके घर वाले और दोस्त बड़े बड़े दावे करते थे. मुझे याद आ रहा है तो फकत एक शेर -

तुझसे बिछड़ा तो पसंद आ गई बेतरतीबी
पहले मेरा कमरा भी गज़ल जैसा था

Sunday 15 January 2012

21वीं सदी की लड़की के नाम !

बड़े अदब और एहतराम के साथ उन सभी लड़कियों के नाम जो लादी हुई ज़िंदगी जीने के बजाय चुनी हुई ज़िंदगी जीना पसंद करती हैं ! कुछ के नाम खास तौर पर ;)

वो लड़की जैसे नग़मा है

स्कूल को जाती बच्ची का

वो लड़की जैसे पैराहन (लिबास)

इक रंग बिरंगी तितली का

वो लड़की जैसे आतिश है

पैकरे (शरीर) हुस्न में जो ढल गई

वो लड़की एक मुहब्बत है

दुनिया से आगे निकल गई

वो लड़की एक बगावत है

सब ज़ंग आलूद(ज़ंग लगे हुए) रिवाजों को

वो लड़की कोई मुसीबत है

सब ना माकूल(अनुपयुक्त) समाजों को

वो लड़की जैसे शाहीं (ऊंचा उड़ने वाला बाज़) है

परवाज़ की हसरत साथ लिए

वो लड़की जैसे सुब्ह-ए-नौ (नई सुबह)

पहचान का परचम हाथ लिए

वो लड़की जैसे ज़र्ब (हथौड़ा) कोई

जिसने बंदिश को तोड़ा हो

वो लड़की जैसे कर्ब (दुख) कोई

जिसने ख्वाहिश को छोड़ा हो

वो लड़की जैसे मां कोई

जिसके पैरों में जन्नत है

वो लड़की जैसे बेटी है

जो घर में है तो बरकत है

वो लड़की जैसे बहन कोई

जो बिन राखी बन जाती है

वो लड़की जैसे दोस्त कोई

जो रूठ के फिर मन जाती है

वो लड़की जैसे जानां (महबूबा) हो

जो छेड़ करे शरमा जाए

वो लड़की जैसे पूंजी हो

जो वक्त पड़े तो काम आए

वो लड़की जैसे फूल कोई

न बनठन है न सजधज है

वो लड़की जैसे जादू है

जिसको देखूं तो अचरज है

वो लड़की जैसे तिफ्ल (बच्चा) कोई

जो चांद की ज़िद पर अड़ जाए

वो लड़की जैसे ग़ाजी (विजेता) हो

जो चांद को भी लेकर आए

वो लड़की जैसे चांद है खुद

जो मेरी ज़मी पर आया है

वो लड़की जैसे सिफत (योग्यता) कोई

जिसको किस्मत से पाया है

Thursday 12 January 2012

ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता

      ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
      ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता
      
       न तो अपना तुझको बना सके
      न ही दूर तुझसे जा सके
      कहीं कुछ न कुछ तो ज़रूर था
      न तुझे पता न मुझे पता
      ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
            
      सारी ख़ुशियाँ तुझपे वार के
      चला मैं तो सब कुछ हार के
      यही इश्क़ का दस्तूर था
      न तुझे पता न मुझे पता
      ये प्यार था या कुछ और था, न तुझे पता न मुझे पता
       ये निगाहों का ही क़ुसूर था, न तेरी ख़ता न मेरी ख़ता 
                                   (अमीर आगा कज़लबाश)

Monday 9 January 2012

एक याद...

कितनी अजीब बात है.. आप खाने-पीने के शौक़ीन हों या न हों, आपकी ज़िन्दगी की सबसे हसीं यादें अमूमन खाने-पीने की चीज़ों से जुडी होती हैं. एक दिन यूं ही अचानक ज़िक्र छिड़ा उन चीज़ों का जिनके स्वाद का लुत्फ़ हमने बचपन में खूब उठाया मगर आज के समय में उन्हें कोई पूछता भी नहीं (दरअसल उनके बारे में लोगों को पता ही नहीं). ये बात भी सामने आयी कि आज भी हम उनके लिए उतने ही लालची हैं मगर या तो जानते नहीं कि उन्हें अब कैसे पाया जाये, या इतनी फुर्सत नहीं कि उनके बारे में सोचा भी जाये.
कुछ ऐसे ही होते थे 'बजरंगी के चने' भी. बजरंगी, एक बूढा व्यक्ति, हाथों में गज़ब का हुनर. दिन में स्कूल में मीठे-चटपटे चने बेचने वाला; शाम को वही चीज़ें राजा बाज़ार (लखनऊ में मेरा मोहल्ला) की गलियों में आवाजें लगाते हुए घूम-२ कर बेचने वाला. याद बेहद धुंधली हो चली है. न तो बजरंगी की शक्ल याद है, न आवाज़ और न ही वो शब्द जिनके कानों में पड़ते ही घर के बड़े तक उतावले हो उठते थे. जी हाँ, एक सड़क पर बिकने वाली चीज़ जो घर में भी शौक से लायी और खायी जाती थी, सो किसी को हक नहीं था की पैसे मांगने पर डांट सके.
वो तीखे चने.. अच्छे-अच्छों के आँख-नाक से पानी निकाल लाने वाले मगर लालच रहता था वहीं का वहीं. और कुछ याद हो न हो वो स्वाद और उन नारंगी-लाल से चनों की शक्ल अच्छी तरह याद है.
पुरानी ही बात है ये भी कि किसी को पापा से कहते सुना था कि बजरंगी मर गया, इस प्रश्न के जवाब में कि आजकल वो दिखाई नहीं दे रहा. पापा को या उस व्यक्ति को कितना अफ़सोस था, याद नहीं, मगर मुझे था तब भी जबकि मरने का मतलब भी ठीक से पता नहीं था.
इस घटना के बाद वो स्वाद दोबारा नसीब नहीं हुआ. वजह कुछ दिनों पहले ही पता चली. वो हुनर सिर्फ बजरंगी के ही पास था, और किसी के भी पास नहीं, यहाँ तक कि उसके अपने बेटे के पास भी नहीं. इस बार ज्यादा बड़ा अफ़सोस हुआ. मेरी इस सोच को धक्का लगा जो ये कहती थी कि जो सामान इस दुकान पर नहीं मिला वो किसी और पर मिल जायेगा. मेरा मन आज भी ललचाता है मगर अब ये असंतुष्टि हमेशा की है.
बदलते समय के साथ कितना कुछ नया देखने को मिल रहा है मगर बहुत कुछ ऐसा है जो पीछे छूटता जा रहा है. हम ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में इतने व्यस्त हैं कि हमें फुर्सत ही नहीं दो पल को पीछे मुड़कर देखने की. वो बेहद आसान-सी खुशियाँ; आज के समय में अस्तित्वहीन; और हम कभी समझा भी नहीं पाएंगे कि बात किस बारे में कर रहे हैं. आने वाले समय में कोई उन्हें जानेगा भी नहीं और हम भी शायद जल्दी ही भूल जायें.
काफी देर से ही सही, मगर बजरंगी को श्रद्धांजलि!



Sunday 8 January 2012

तुम जितना निर्मम होगे मै उतना प्यार करूंगा साथी

तुम जितना निर्मम होगे मै उतना प्यार करूंगा साथी

अन्तरमन में बसे प्रेम को तुम ऐसे ही झुठलाना
दग्धकंठ से निकले स्वर को सुनकर भी तुम मत आना
किंतु तुम्हारे हर निर्णय का मै सत्कार करूंगा साथी

तुम जितना निर्मम होगे मै उतना प्यार करूंगा साथी

मेरे प्रति बन जाना तुम बन सकते हो जितने क्रूर
मेरी स्मृतियों तक से तुम प्राणप्रिये हो जाना दूर
हर स्थिति के लिए स्वयं को मै तैयार करूंगा साथी

तुम जितना निर्मम होगे मै उतना प्यार करूंगा साथी

मेरे ऊपर वरीयता देकर तुम औरों को चुन लेना
मै इस पर भी राज़ी हूं बस इतना तुम सुन लेना
प्रेम का दरिया मै एकाकी, फिर भी पार करूंगा साथी

तुम जितना निर्मम होगे मै उतना प्यार करूंगा साथी